माता
शिकारी देवी का मन्दिर मण्डी जिले से लगभग 100 km की दूरी पर स्थित है। मण्डी रियासत का नामकर्ण ऋषि माण्डव के नाम पर हुआ है।
जब भगवान शंकर पर्वतों के
राजा हिमवान् ( हिमालय ) की पुत्री पार्वती जी से ब्याह करने के लिए कैलाश धामों से
बारात लेकर पार्वती जी के घर पहुचे तो बाराती वहाँ विश्राम करने हेतु दो-घड़ी के
लिए सो गए। तभी भगवान शंकर सृस्टि संचालन के किसी महत्वपूर्ण कार्य की पूर्ति हेतु
वहाँ बारातियों को अकेला छोड़कर अदृशय हो गये।कई दिन बीत जाने पर भी जब भगवान
शंकर वापिस न आए तो माता पार्वती बड़े ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। उस समय वहाँ एक तेजस्वी
ऋषि पधारे। उन्होने अपने-विधान से मण्डप के अन्दर अनुस्थान किया और भगवान शिव का
आवाहन किया। कुछ ही क्षणो में भोले नाथ वहाँ प्रकट हो गए। भगवान शिव को देखकर माता
पार्वती ओर बाराती-गण बहुत खुश हुए।
| शिकारी देवी मन्दिर(जंजैहली,मण्डी) |
प्रसन्न होकर जब माता ने ऋषि से उनका नाम पूछा तो ऋषि बोले
कि जिस नाम से भगवान शंकर उन्हें बुलाएगे, वही उनका नाम होगा। इस पर शिवजी बोले हे ऋषि ! तूने मेरे मण्डप के बीच
आकर पुरोहित का कर्म निभाया है और पार्वती को चिन्ता मुक्त किया है इसलिए तुम पूरे
संसार में ऋषि मण्डप के नाम से जाने जाओगे। बाद में ऋषि मण्डप महाऋषि माण्डव के
नाम से प्रसिद हुए और उन्ही के नाम पर इस रियासत का नाम मण्डी पड़ा।
माता पार्वती ने ऋषि मण्डव से
कहा कि हे महात्मा ! आपकी कृपा से मैं चिन्ता मुक्त हुई हूँ, इस से मैं आप पर बहुत प्रसन्न हूँ, बताइए मैं आपकी
क्या इच्छा पूरी कर सकती हूँ? पार्वती जी की बात सुनकर मण्डव जी ने कहा कि माता शंकर जी कि कृपा से
मेरा जीवन धन्य हो गया है, लेकिन जिस स्थान पर आप खड़े हो वह
मेरी कर्म भूमी है, अगर इस स्थान पर आपकी कृपा हो जाए तो यह
भी धन्य हो जाएगा। मेरी इच्छा है कि आप इस रियासत कि रक्षा करें, यहाँ के लोगों पर कोई विपत्ति न आए। ऋषि कि बात सुनकर माता ने कहा कि
आपकी इच्छा पूर्ण होगी और मैं इस रियासत के सबसे ऊँचे पहाड़ पर अपने अंश रूप में
निवास करूंगी और यहाँ के लोगों की रक्षा करूंगी। तब से माता पार्वती मण्डी रियासत
के सबसे ऊँचे पर्वत पर निवास कर रही हैं।
To be continued...
आपने यह कहानी कहां से ली है कृपया मुझे बताइए
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