अर्जुन के प्रथर्ना करने पर श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को
अपना दिव्य स्वरूप के दर्शन कराते हुए कहा— हे अर्जुन ! मैं भूतों के हृदय में स्थित सबकी आत्मा हूँ
तथा सम्पूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ।
मैं अदिति के बारह पुत्रो में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा
मैं उनचास वायु-देवताओ का तेज़ और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ।
मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इन्द्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और भूत
प्राणियों की चेतना हूँ। मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में
धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओ में अग्नि हूँ और शिखर वाले पर्वतों में
सुमेरु पर्वत हूँ। पुरोहितों में उनके मुखिया वृहस्पति हूँ।
पार्थ !
मैं सेनापतियों में स्कन्द और जलाशयों में समुद्र हूँ। मैं मह-ऋसियों में
भृगु और शब्दों में ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने
वालों में हिमालय पहाड़ हूँ। मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देव-ऋषियों
में नारद मुनि, गन्धर्वो में चित्ररथ और सिद्धों में’ कपिल मुनि हूँ। घोड़ों में अमृत के साथ उत्पत्र होने वाला उश्रौ:श्रवा
नामक घोडा, श्रेष्ठ हाथियों में एरावत और मनुष्यों में राजा
हूँ।
मैं शास्त्रों में वज्र और गौओ में कामधेनु हूँ। शास्त्रोत्क
रीति से संतान की उत्पति के हेतु कामदेव हूँ और सर्पो में सर्पराज वासुकि हूँ। मैं
नागों में शेषनाग, जलचरों और जल-देवताओ में उनका
अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्षमा नामक पितरों का ईश्वर तथा शासन करनेवालों
में यमराज मैं हूँ।
मैं दैत्यों में प्रह्लाद
और गणना करनेवाले ज्योतिषियों का समय हूँ तथा पशुओ में सिंह और पक्षियों में मैं गरुड़
हूँ। मैं पवित्र करनेवालों में वायु और
शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्रीभागीरथी गंगाजी हूँ।
अर्जुन ! सृष्टियों का
आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्द्योंओ में अध्यात्म विद्द्या और परस्पर
विवाद करनेवालों का तत्वनिर्णय के लिए किया जानेवाला वाद हूँ।
मैं
अक्षरों में आकार हूँ और समासों में द्वन्द्व
नामक समास हूँ। अक्षयकाल – कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला-विराटस्वरूप
भी मैं ही हूँ। मैं सबका नाश करनेवाली मृत्यु और भविष्य में होनेवालों का
उत्पत्तिस्थान हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ एंव गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और
छंदो में गायत्री छन्द हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुयों में वसन्त मैं
हूँ।
मैं छल कारनेवालों में जुआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव
हूँ। मैं जीतनेवालों की विजय हूँ, निश्चय करनेवालों का निश्चय और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।
मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ। मैं दमन
कारनेवालों का दण्ड हूँ, जीतने की इच्छावालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवालों का तत्वज्ञान मैं
ही हूँ।
अर्जुन !
जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं
ही हूँ; क्यूंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है जो मुझसे
रहित हो। परंतप ! मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है, मैंने
अपनी विभूतियों का यह विस्तार तो तेरे लिए संक्षेप से कहा है।
जो-जो भी विभूतियुक्त,
कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वशतु हैं, उस-उसको तू मेरे तेज के
अंश की ही अंभिव्यक्ति जान। मैं इस
सम्पूर्ण जगत को अपनी योग शक्ति के एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ।
Hello Professor
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